बुज़ुर्गों से बेज़ारियत से नाता मत बना
उनकी ही उंगलियों को पकड़ कर है तू चला
कोई तो तुझको सवारने मे हुआ होगा फ़ना
तेरी शक्सियत वरना कुछ होती क्या भला ?
उनके खून पसीने से तेरा सेज सज़ा है
शान से खड़ा है तू ज़िंदगी के अगले पायदान पर
अगर वो ना होते, अगर वो ना होते
तू शायद अभी भी फसा रहता रोटी कपड़ा और मकान पर
उनसे बदलने की उम्मीद ना तू कर
तू भी शायद उस उम्र मे बदल नही पाएगा
इतना भी मुश्किल नही है, उनको समझने की कोशिश तू कर
यकीन कर, इसमे तेरा ज़्यादा कुछ नही जाएगा
ज़िंदगी के आखरी दौर से वो गुज़र रहे हैं
उस दर्द और मजबूरी का एहसास कर
कुछ और नही तो नही, उनके तजुर्बे का ईमान कर
अपनी परवरिश का वास्ता, ना तू बेईमान बन
कुछ और नही तो नही, कम से कम इंसान बन !